खुदा का शुक्र मना रहा दो जान के सिर पे,
गलतफहमियां अाई नई अब भी हमारी चौखट पे,
बंदगी रही होगी जन्मों के प्यासी जिल और सागर के बीच,
तभी तो सारा संसार हो रहा है जल कर प्यासा बुझाने को,
कह दिया, मुंह फेर लिया गर महोब्बत को बचाने को,
जूठ तो सही फिर भी रूह के जुड़े ख्वाब से दूर जाने को,
जहर पिलाया गया मीठे अल्फ़ाज़ से तो इश्क़ भी तो फिसला था,
इबादत की खुदा ने वो इश्क़ भी आज कहीं मुरजाया मिला था,
अक्सर वास्तविक रूप से जाना जाए ईमान के जरिए को,
हमेशा अतीत से जुड़ा वस्ता दुख नहीं देता जमाने को।
फरेबी नहीं बनते वो शक्श यूहीं कहीं हर मौड पर,
अटूट बंधन को बचाने खुद मजबूरन हस्ता चहेरा दिखता है जमाने को।
नादानियों के किस्से हर बार हर जगह सुनाई देते है,
मानसिक तनाव से तंग हो कर जूझ रही जिंदगी है।
अक़्सर वक़्त ऐसा आता है जहा हम कुछ सोच नही सकते,
क्या उसे हम सब भूल कर नई जिन्दगी का लम्हा नहीं बना सकते।
कसूरवार बना वक़्त खुदकी नियति का लिखा था,
क्या उसे एक बार मौका दे भविष्य नहीं बता सकते।
गर हो जाए गिलासिकवा बहुत अंदरुनी गहराई से,
माफी मांग लेंगे इश्क़ को हूबहू दिल से हरबार रिश्ता निभाने को।
DEAR ZINDAGI 🤗❣️