चलो कहीं दूर बेटियों का जहाँ अलग से बसायें।
रहें जहाँ वे महफूज़ उन्हें कोई डर न सताए।
जहाँ वे देवी नहीं बेटियां बन कर ही रहें
न हो कन्या पूजा का ढोंग उनके साथ।
कम से कम उन्हें इंसान ही समझा जाये।
जहाँ पर न हों दरिंदे हत्यारे और हैवान
और न हो कोई बेटी बलात्कारी से परेशान।
जहाँ हर बेटी सुकून की सांस ले पाये।।
क्योंकि अब इस दुनिया से भरोसा उठ गया
कोई भी अब यहाँ सुरक्षित नहीं रह गया।
भगवान भी न अब बेटियों को बचाये।
ऐसा सुंदर जहां हो जहाँ निर्भय हों बेटियां
फूलों सी खिलें और मुस्कराएं बेटियां।
किसी माँ को बेटी की चिंता न सताए।
चलो सब बेटियां रुखसत हो जाएँ यहां से
अलविदा कह दें इस हैवानों के जहां से।
कब तक रूह का बलात्कार कराएं।
बस अब और नहीं और नहीं
या फिर अपने ही हाथों अपनी बलि चढ़ाएं।
दुनिया के हैवानों से खुद की बचाएं।
पढ़ कर भी देख लिया बढ़ कर भी देख लिया
इस पुरुष का हर जुल्म सह कर देख लिया।
अपनी अर्थी अपने कन्धों पर कैसे उठायें।
चलो दम घुटता है यहां चलो यहां से
दूसरा जहाँ हम बसायें..............।
स्वरचित
जमीला खातून
झाँसी उत्तर प्रदेश