कबाब में हड्डि सा, आप महानुभावों में फिसड्डी सा
मै रुकना तो नहीं चाहता
पर ये कलम जब मन की तरंगों से
स्याही भरकर #स्वचालित चलती है
तो फिर मेरी जिंदगी की पढ़ाई का
मेरी इस टूटी फूटी लिखाई पर कोई अंकुश नहीं रहता
बेशक शब्दों को खींचकर बांध लेता हूं
क्योंकि दिल के जज्बातों में इनका डूबना अच्छा नहीं लगता
#स्वचालित