जीवन के उस मोड़ पर मिले हम जहाँ तुम्हें भी समय नहीं था, जहाँ मुझे भी समय नहीं था। हम दोनों ही व्यस्त थे कदाचित परिस्थितियों में उलझे हुए थे। परन्तु प्रेम की गति धीमी थी, उसे अत्यंत धैर्य था। वो धीमी गति से हौले-हौले मेरे हृदय में अपना स्थान बना रहा था।
मुझे खेद है तुमसे मिलने का, क्योंकि तुम्हारा मिलना स्वप्न जैसा था। पलक झपकते ही जैसे स्वप्न टूट जाता है। वैसे ही तुम मुझसे दूर हो गए। स्वप्न में तो हम स्वयं को जगाकर सहानुभूति दे सकते हैं। परन्तु वास्तविक जीवन में प्रेम से वियोग होने पर स्वयं को सहानुभूति देना मुझे नहीं आता।
तुम्हारा असर मुझ पर कैसे हुआ मुझे नहीं पता। तुम्हारी ओर कब मेरे कदम बढ़े अथवा कब तुम्हारे रंग में रंगी.. सच कहुँ तो मैं तो यह भी नहीं जानती की मेरे हृदय में प्रेम का अंकुर कब फूटा, कब वह पौधा बना और कब वह विशाल वृक्ष बन गया।
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कभी समुन्दर किनारे बैठे लहरों से पाँव को भिगाया है तुमने..? वही लहरें क्या पाँव को छूकर हृदय को भिगा पाती हैं..?
नहीं ना..?
परंतु प्रेम में स्थिति अलग होती है। इसमें मनुष्य के पाँव नहीं पहले हृदय भीगता है।
मेरे साथ भी यही हुआ। वो लहरें मेरे हृदय तक का रास्ता खोज लीं। फिर वो प्रेम की लहरें मेरे हृदय से होती हुई मेरी रूह को भिगाती चली गईं, और वो प्रेम का पौधा विशाल वृक्ष बनता चला गया।
परंतु आज इस वृक्ष की शाखाएं मुझे कष्ट देने लगी हैं।
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सुनो, जब मैं शिकायतें होने के बाद भी तुमसे व्यक्त नहीं कर पाती। जब तुम पर चाहकर भी अपना अधिकार नहीं दिखा पाती। कभी सोचती हूँ तुमसे स्पष्ट रूप से कह दूँ की तुमसे प्रेम करती हूँ, परन्तु उपेक्षा के भय से कह नहीं पाती.. तब अत्यंत कष्ट होता है मुझे।
खेद होता है कि क्यों तुमसे मिली या क्यों तुमसे ही प्रेम हुआ मुझे।
इतने लोगों में तुम पर ही क्यों हृदय स्वयं को हार गया।
मेरे लिए तुम्हारे सम्मुख प्रेम व्यक्त करना असंभव है क्योंकि कभी एकांत में भी तुम्हारी तस्वीर को ही गौर से देख पाने का साहस नहीं जुटा पाई हूँ।
सच ही कहा है किसी ने "प्रेम मनुष्य को निर्बल बना देता है"।
कभी-कभी ऐसा लगता है इस वृक्ष की जड़ें मेरा दम घोंट रही हैं। फिर झटपटाकर जब मैं इस वृक्ष को ही काटने का सोचती हूँ, अर्थात प्रेम का अंत करना चाहती हूँ, तो नहीं कर पाती। कदाचित यह भी सम्भव नहीं होगा।
क्योंकि वृक्ष चाहे प्रेम का ही क्यों ना हो मगर इस वृक्ष को लगाया भी तो मैंने ही है। इसके लिए पूर्ण रूप से उत्तरदायी भी मैं ही हूँ।
पापा जी कहते हैं.. "जिस वृक्ष को स्वयं लगाया हो, उसे कभी काटा नहीं जाता"।
मैं नहीं काटूँगी इस प्रेम के वृक्ष को।
काट ही नहीं पाऊँगी, फिर चाहे यह वृक्ष मुझे फूल के रूप में विरह दे अथवा फल के रूप में कष्ट।
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