मां के हाथों के भोजन में , वो स्वाद कहां से आता है
जो दूजे हाथों से कदापि , वह स्वाद नहीं मिल पाता है
अमृत - तुल्य स्वाद जाने कहां से , मां के हाथों में बसते हैं
जिसके लिए मानव तो क्या , श्रीराम कृष्ण भी तरसते हैं
लाख उठाए कष्ट सभी , जिम्मेदारी से कभी भी भागी नहीं
संतान की खातिर दुनिया में , मां जैसा कोई भी त्यागी नहीं
बच्चों को प्यार करे जितना , उसके जैसा कोई रागी नहीं
बचपन में नहीं कोई रात गई , जिसमें मां रात भर जागी नहीं
निस्वार्थ समर्पित प्यार सदा , केवल मां ही कर सकती है
हस्ती जो कभी - कहीं झुकी नहीं , वह मां के चरणों में झुकती है
ऐसे भाव हों जिस तन में , उस हांथ से अमृत क्यों ना बरसे
हम तुम क्या ये सारी दुनिया , मां के हांथ के स्वादों को तरसे
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#स्वादिष्ट