शावर के नीचे घंटों खड़े होकर आवाज़ को दांतों तले भींचकर बेतहाशा रोना..
रात में बत्ती बुझा अंधेरे कमरे में दिल के टुकड़ों को खुरच-खुरच कर समेटना.. और सब के सोने के बाद खुद के ख़त्म हो चुके अस्तित्व को उसके अंत से घसीटकर वापस लाने की हर एक जद्दोजहद.. हर एक दर्द.. से मैं परिचित हूँ।
किसी ज़ख्म पर आई नरम चमड़ी को खींच देना, मुँह में हुए छाले को दाँतों से काटना, दर्द से युक्त अंग को और कष्ट देना.. दर्द देता है मगर इससे भी अधिक दर्दनाक होता है आँखों में आँसुओं को भरे रहना, पर बहने नहीं देना। चीख को अंदर ही अंदर दबाना और दुःख में खामोश हो जाना।
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मैं जानती हूँ इस दर्द की टीस शरीर को नहीं मन को अकेला करती है और दीमक बन दर्द खाता है खुशियों की अंदरूनी सतह।
खुद के साये से भी होती उलझन मुझे समझ आती है।
आईने में उभरती खुद की छवि स्वयं को ही जब खटकने लगती है, तब इस अंदरूनी छिल चुकी देह की पीड़ा मुझे समझ आती है।
क्योंकि दु:ख एकांत मांगता है।
दु:ख एकांत चाहता है।
आँखों की नींद आंसू बन रात तो काट लेती है, मगर दिन का उजाला आँखों को सुई की भांति चुभता है।
घर का हर वो कोना जो खुद से खुद को मिलने ना दे हृदय को भाने लगता है। ज़मीन पर बैठ पैरों को मोड़ खुद के चेहरे को छुपाना और इस छुपने की कोशिश में पलंग के नीचे वक़्त बिताना, केवल भागना है.. दूसरों से नहीं बल्कि स्वयं से भागना।
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यह एकांत मांगता है शरीर या शायद इस शरीर के कष्टों से निजात के उपाय।
मैं जानती हूँ एकांत कितने सवाल करता है। ऐसे सवाल जो जवाब तो नहीं मांगते मगर कचोटते हैं अंतरआत्मा।
जीवन केवल मनोरंजन का साधन बन जाना, भूख, प्यास केवल जीवित होने की शर्त होना, त्यौहार की धूम आँखों को लाल कर जब अतीत की यादों में छोड़ती है ना, उस वक़्त खुद से लड़ना, कितना मुश्किल है मैं जानती हूँ।
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किसी कमरे में लगे आईने के सामने अकेले में मुस्कुराने का विफ़ल प्रयास करना और फिर आख़िर में भरी आँखों के संग मुस्कुराना, और एक दिन इस झूठी ख़ुशी को सीखकर खुद से छल करना मैं जानती हूँ।
स्वयं से भागते-भागते पाँव नहीं दिल का थकना और इसी थकान में बेवज़ह ही खुद से उमड़ती शिकायतों की एक लंबी फ़ेहरिस्त लिख उसे फाड़ कर खुद को फिर एक और नए दिन के लिए तैयार करना कितना झूठा होता है मैं जानती हूँ।
यह जो मैं इन बातों के अर्थ जानती हूँ ना.. यही है असल कष्ट, क्योंकि मैं यह भी जानती हूँ की दुःख एकांत क्यों माँगता है।
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