विधवा जीवन
क्या गुजरी होगी उस नारी पर जब सिंदूर को धोयी होगी।
बनकर विधवा एक नारी किस्मत पर कितना रोई होगी।
उजड़ गई जिसकी बगिया , गोदी हो गई जिसकी सूनी।
विधवा होना किस्मत था तभी तो ऐसी हुई
अनहोनी।
इनको भी इस समाज में मिलना चाहिए उचित
सम्मान।
लेकिन जग की व्यथा है उल्टी सभी करते उनका अपमान।
नहीं बनता कोई सहारा उनका नहीं देता है कोई
साथ।
विधवा को समझे अभागा सभी छुडा लेते हैं
हाथ।
जग की ऐसी कुरीतियाँ का शिकार हो जाती हर विधवा।
जिनका कोई दर्जा नहीं समाज में ऐसी बन जाती विधवा l
दुःख से भरा जीवन कटता सहनी पड़ती है हर पीड़ा कठिनाई l
यही मंजूर था वक्त को तभी तो एक नारी विधवा कहलाई।
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जय हिंद 🇮🇳🇮🇳
vp army ⚔️🇮🇳