पसन्द न था उसे फिर से सजना फिर से सँवरना फिर किसी और क नाम का सिंदूर मांग में लगाना,
मैने तो चाहा था उस #विधवा के रंग हीन जीवन मे प्यार का रंग लगाना,,
वो बोली ऋषभ जानती हूं तुम रंग हो मुझे रंग से भर ही दोगे,
लेकिन एक अजीब सा सुकून है फौजी की #विधवा कहलाना,
#विधवा