तुम आगे बढ़ो मुझे यहीं रहने दो
आज कल कंधों में दर्द सा रहता है
बैठ कर सोचा इस दर्द के बारे में तो सारे ख्याल उमड़ पड़े दुनिया के बारे में,
ये दर्द जो मेरे कंधे पर था दुनिया का इसमें हाथ 90% था।
मैं खुशी से भ्रम के कोहरे में जी रही थी ये कोहरा धूप से ज्यादा अच्छा था क्योंकि इसमें दुनिया का सारा मैल छुप जाता था।
एक दिन यूं ही अपनी धुन में गुम आगे बढ़ रही थी मैं
किसी ने हाथ खींचा और कड़ी धूप में ला पटका, मेरे सामने दुनिया का नया चेहरा आ लपका।
गाड़ियों की तेज़ आवाज़, धूल, हर तरफ मुंह दबाए करोड़ों लोगों के मौन का शोर जो उनकी आवाज़ से भी तेज था वो सब बाहर आया मुझे बहरा करने।
मैं भागी किसी पेड़ के छांव की तलाश में, वहां लटकी मिली मुझे लाश, ज़िन्दगी की आस में शायद ये भी आई थी अपने सपनों को पूरा करने के फिराक में।
खुशनुमा कोहरे की जगह ज़हरीला धुआं ले चुका था मुझे आगोश में, नदी में अब पानी नहीं मछली नहीं, पेड़ दब कर मर चुके थे उम्दा भवन की आड़ में,
मैं फिर से भागी सांसों के अभाव में शायद अभी भी जिंदा थी शहर में गांव ढूंढने की प्यास में
गर शहर के किसी कोने में डर से छुपा बैठा हो गांव तो वहीं रोक लेना उसे, देखो बाहर ना आने पाए शहर में उसके पांव
ये शहर है साहब, जो इस शहर जो बनाता है ये उसे ही निगल जाता है, बस चुपके से मेरे गांव की सांसे चलने दो, तुम आगे बढ़ो मुझे यहीं रहने दो।