“हमारे लिए सब एक समान हैं बाबू लाल। ना कोई बड़ा, ना छोटा। केवल इंसाफ़ की बात करेंगे”, गाँव के सरपंच ने ज़मीन पर बैठे बाबू लाल को कहा।
“पर साहिब। फ़ैसला सोच कर करियेगा। हमने सब क़र्ज़ा चुकाया है। भला क्यूँ हमारा ज़मीन हमें वापिस नहीं मिलेगा?”, बाबू लाल ने कहा।
“अरे तो हम तो कुछ नहीं कह रहे। आज पक्का फ़ैसला हो जाएगा। धीरज रखो”, सरपंच बोले
“ठीक है। थोड़ा पानी पिला दो सरपंच जी। बहुत प्यास लगी है”, बाबू लाल ने कहा
मुन्ना जा वो जो सुराही रखी है ना। अबे! वो नहीं। वो तो हमारी है। वो जो बरामदे में रखी है, पीली धारी वाली। हाँ। उसी में से एक गिलास पानी ला दे।
मुन्ना ने बाबू लाल को पानी थमाया और बाबू लाल एक बार में पूरा पानी पी गया। प्यास तो उसे और भी लगी थी लेकिन हिम्मत हाई नहीं हुई दूसरी बार पानी माँगने की।
थोड़ी देर में ज़मींदार भी आ गया। वो अपनी गाड़ी से उतरा भी नहीं था कि सरपंच उठा कर हाथ जोड़ कर खड़े हो गये।
“माफ़ करना सरपंच जी, आपको तो पता है कि कितना काम आ जाता है सुबह-सुबह। आपके लिये ये घी ले कर आये हैं। धर्मपत्नी ने भिजवाया है। शुद्ध घी है”, ज़मींदार ने कहा।
“अरे इसकी क्या ज़रूरत थी?”, सरपंच ने झट से घी पकड़ते हुये कहा।
“माफ़ कीजियेगा सरपंचजी लेकिन जल्दी कीजियेगा। बहुत गर्मी है यहाँ”, ज़मींदार ने अपने रेशमी करते से रूमाल निकाल कर पसीना साफ़ करते हुये कहा।
“हाँ हाँ। ज़मींदार साहब। ये बाबू लाल तो सुबह से ही धमका हुआ है। चलो करें फ़ैसला।” ज़मींदार ने कहा।
बाबू लाल हाथ जोड़े व सिर झुकाये खड़ा रहा।
ज़मींदार और सरपंच कुर्सी पर बैठे और बाबू लाल फिर से गमछे से पसीना पौछ कर ज़मीन पर बैठ गया।
हाँ रे बाबू लाल। अब हमारे ख़िलाफ़ सरपंच के पास जाओगे”, ज़मींदार ने काला चश्मा हटा कर बाबू लाल को देखते हुए कहा।
“बाबू जी। वो ज़मीन। हमने क़र्ज़ा चुका दिया बाबू जी। आप हिसाब देखिये”, बाबू लाल ने डरते हुये कहा।
“अच्छा अब हिसाब समझाओगे हमें। भूल गए जब हाथ फैलाते हुए रात में आ गए थे। हाँ झूठे हैं क्या? तुम जैसे लोगों पर विश्वास करना हाई ग़लत था”, ज़मींदार बोला।
बाबू लाल को समझ नहीं आया कि क्या बोले।
“अबे चल। हम मज़ाक़ कर रहे थे। आज हम अच्छे मूड में हैं। हमारी बिटिया की शादी है ना। अच्छा चल वो जो खेत था ना वो हमने तुझ वापिस किया। लेकिन एक चौथाई फसल हमें चाहिये। बोलो मंज़ूर कि नहीं?”, ज़मींदार फिर से बोला
बाबू लाल अपनी ही ज़मीन को वापिस पा कर और अपने हिस्से की फसल पहले से अमीर ज़मींदार को देने को झट से राज़ी हो गया और जा कर ज़मींदार और सरपंच के पाँव छू आया।
“हमने कहा था ना, फ़ैसला मिलेगा। हमारे लिए सब एक सामान हैं”, सरपंच बोला।
बाबू लाल ज़्यादा सोचे बिना ज़मींदार और सरपंच के बड़प्पन से ख़ुश था और खुद को बोला, “सब एक समान होते हैं बड़े लोगों के लिये”।
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