रात के अंधेरे में रमेश कौल अपनी गर्भवती बीवी, आठ वर्ष के बेटे का हाथ पकड़ कर जल्दी जल्दी पैदल चल कर जा रहे थे। बीवी को पेट में हल्का सा दर्द हुआ तो वो जीभ मींच कर चुपचाप चलती रही।
रमेश कौल ने बीवी से पूछा कि वो ठीक तो है। बीवी ने हाँ किया और चलते रहने को कहा। उसे पीछे से धीमे धीमे आवाज़ें अब भी आ रही थी। “यहाँ रहना है तो हमारा कहना मानो। जिसमें हम मानते हैं, उसी को मानो। जाओ काफिरों, अपनी बीवी-बेटी को हमारे लिए छोड़ते जाना”।
रमेश कौल ने अपने कदम और तेज़ी से बढ़ा लिये।
उनका आठ वर्ष के बेटे न रमेश कौल को सेबों का बाग दिखते हुए बताया कि कैसे वो अपने दोस्तों के साथ चुपके से अंदर घुस कर लाल-लाल सेब तोड़ कर लाया था और उन सब दोस्तों ने इतने सेब खाए थे कि उनका पेट दुखने लगा था। रमेश कौल बेटे की बात सुन कर एक मुस्कान देने की कोशिश की और उसे जल्दी चलने को बोला।
बेटे ने भी कदम तेज कर लिए और चुपचाप चलने लगा। आख़िरकार बस अड्डा आ ही गया। वहाँ संजय रैना भी खड़े थे।
और दिन होते तो शायद दोनो दोस्त बहुत सी बातें करते लेकिन आज दूर से सिर हिला दिया। संजय रैना अपनी बहन के घर राजस्थान जा रहे थे और रमेश कौल? उनको खुद नहीं पता था कि कहाँ जाना है। संजय रैना जाने को हुए तो दोनों दोस्तों ने केवल गले मिले और बोले कुछ नहीं।
क्या बोलते?
रमेश कौल को लगा कि जम्मू जाना बेहतर होगा। जैसे ही परिस्थितियाँ सही होंगी वो अस्थाई घर छोड़ कर अपने घर को चल देंगें।
जम्मू की टिकट हुई। उन्हें सरकारी आवास तो नहीं कहेंगे, पर हाँ रहने को रंक जगह मिली। रमेश कौल रोज़ाना अखबारे पढ़ते लेकिन अभी भी वो घर नहीं जा पा रहे थे। उनकी बीवी काफ़ी उदास थी। जो औरत हंसते हुए नहीं थकती थी उसने बोलना तक काफ़ी सीमित कर दिया था। रमेश कौल उन्हें समझाते कि जल्दी हाई ये अस्थायी जगह छोड़ कर अपने घर को जाएँगे। लेकिन बीवी केवल सिर हिला कर चुप हो जाती।
तीन हफ़्तों बाद उनकी बीवी ने एक बेटी को जन्म दिया। रमेश कौल को हमेशा से एक बेटी की चाहत थी। उन्होंने अपनी बीवी के साथ मिल कर बच्चों के लिए अनेकों सपने देखे थे। लेकिन बीवी अब भी केवल काम की बात करती।
लगभग दो वर्षों के बाद एक दिन रमेश कौल के बेटे ने पूछा, “पापा! क्या पढ़ रहे हो?”
उन्होंने बताया, “अख़बार। सरकार कुछ तो करेगी ना। हम भी तो इसी देश कि हैं।
बेटा, “क्या अब ये घर है?”
रमेश कौल, “नहीं। यह अस्थायी घर है”
बेटा, “अस्थायी मतलब जो हमेशा के लिए नहीं होता। हैं ना पापा। हमारी मैडम ने बताया था”।
रमेश कौल ने हामी भरी।
“तो क्या हमारा पहाड़ वाला घर भी अस्थायी था? वो भी तो हमेशा के लिए नहीं रहा”।
रमेश कौल उस रात पहली बार रोये।
क्या स्थाई? क्या अस्थायी?
#अस्थायी