जमाना देख लो आज
हर कोई जीता है खुद काज
लेकिन इन हर कोई के बीच
था एक बंदा नेक दिल
थी सारी दुनिया गुनेहगार
कैसे भरोसा करे परवरदिगार
बंदे के सामने आया एक भ्रष्टाचारी
आया डर भीतर, अब बंदे की बारी
बना दिया गया उसे मजबूर हर तरफ से
फँस जो पड़ा था हर दबाव से
उठा लिया हथियार भारत माँ की रक्षा मे
कर दिए कई घाव भ्रष्टाचारी की काया मे
साबित हुआ जुर्म, पेश किया गया अदालत में
जज्बे के सातब आया बंदा, खड़ा हुआ कटघरे में
सबूतों के उसूल पर साबित हुआ अपराधी
सामने आया वह अकेला न था अपराधी
हिम्मत देख बंदे की जज हुए खुश
जवाब पाने के लिए कुछ सवाल लिए पूछ
लगा नही डर, उस भ्रष्टाचारी को मारने मे?
डर तो लगा, लेकिन था उससे बड़ा डर दिल के एक कोने में
कैसे रहता मैं खुश भारत माँ को बेचने मे।