मै तुमसे मिलने को और
खुद को तुमसे मिलाने को,
केवल एक शाम की प्रतीक्षा कर रहा हूं,
और एक-एक करके शामें
रोज व्यतीत होती जा रही हैं,
मै अब भी हूं प्रतीक्षा में तुम्हारी "हां" के,
जिसका वचन तुमने पहली बार
मेरे हांथो पर अपना हांथ रख के
जाते हुए "फिर मिलने पर जरूर"दिया था,
पर मुझे आज भी याद है तुम्हारा
वो तर्क जो तुमने उस समय दिया था,
कि शाम के तुरंत बाद ही हो जाता है अंधेरा,
और नहीं दे सकती मै
और अधिक समय तुम्हें,
ये समाज करेगा प्रश्न हमारे प्रेम की पवित्रता पर,
आज तक मै तुम्हारे इस
तर्क की गहराई पर,
शाम में अकेले बैठे ही करता रहता हूं विचार कि,
मुझे अब करना चाहिए
किस बात का इंतज़ार?
तुम्हारे उस वचन का जो तुमने उस दिन दिया था,
या इस "दुष्ट समाज" को
एक"शिष्ट समाज" होने का
और मुझे ये दोनों ही विचार अनंत से लगते हैं।
..रॉयल..