दोस्ती
बड़ी तमन्ना रही माटी के ,
पुतले से दोस्ती की,
बैठी एक पेड़ पर,
आस लिए,
नीचे नदी थी ,
भावनाओं की |
अचानक हवाओ ने ,
रूख बदला,
एक एक कर उड़
गये सभी |
जिस डाल पर मै ,
बैठी थी , वहाँ दरार थी,
पहले से ही |
टूटा डाल गिरने को हुई,
नदी मे कि , एक हाथ ने,
सम्भाला तभी |
हे गिरिधारी वो तुम्ही थे,
तुम्हारे सिवा, कोई दोस्त नही |