जीवन को खोला तो
वह नगर- नगर में टहल रहा था,
गाँव-गाँव में बसा हुआ था
राह-राह से गुजर रहा था।
आकाश से गिरकर
धरती पर आ रहा था,
साँसों को थाम कर
उसे दूर देख रहा था।
प्यार की चाह में
रिश्ते अद्भुत बना रहा था,
डगर को घुमा कर
टूट से उबर रहा था।
जीवन को खोला तो
हमसे ही निकल रहा था,
आँसू को ढूंढा तो
हम में ही तैर रहा था।
* महेश रौतेला