‘तू, बार बार वजूद मेरा मिटाना…
बहुत दिन भए अब
निराशा-उदासी के जंजाल के,
देखें, नभ में उड़ते परिंदों को
फिर, उड़ाने की नई कहानी लिखें।
वो भी समय था
जो गुजर गया
ये भी गुजर जाएगा
आओ, मिलकर कोई ऐसी रचना करें
हम गुजर जाएं
औऱ, वक्त याद करे।
रोना-धोना, लुटना-पिटना
जीवन का एक हिस्सा है
कुछ तुमने खोया,
कुछ हमने खोया।
जो पाया, उसकी चर्चा है
ग्रंथ अब एक नया
लिखने को हम आतुर हैं।
लाख चाहा मिटाने को
माटी ने हर बार ढाल दिया।
फिर, नए सिरे से तैयार हूं
सपनों को देने नई उड़ान
तुम करना लाख कोशिशें
वजूद मेरा मिटाने की
मगर,
मैं, हर बार
हौसलों की उड़ान भरता जाऊंगा
नामों-निशां छोड़ता जाऊंगा।