मैं शून्य पे सवार हूँ= जाकिर खान द्वारा वीर रस में लिखी गयी यह कविता
मेरे इस कविता में शून्य हम सब के नकारात्मक पहलुओ को दर्शा रहा है, जो हमे आगे नही बढ़ने देती । आप सभी से निवेदन है🙏 मेरे इस कविता को पूरा पढ़े और अच्छा लगे तो लाइक दीजिये
क्यों मैं शून्य पे सवार हूँ
तू क्यों शून्य पे सवार है
ना जग तेरे ये साथ है
बस...अंधेरी रात है
बस...इतनी सी तो बात है
तू तो जुगनुओं का यार है
फिर क्यों शून्य पे सवार है
वो शाम है जो ढल गया
तू क्यों शाम से भी डर गया
जब है मशाल हाथ में
फिर क्यों शून्य तेरे साथ है
जब तक ये शून्य तेरे साथ है
ये शाम बन रहा विराट है
ये जिंदगी तो एक है
जिसमें पड़ाव अनेक है
हर दिन नए पड़ाव में
बस तेरी ये सोच है
जो हो रही मिसाल है
अगर न बन रहा मिसाल तू
तो ये शून्य ही बेमिसाल है
जो रोकती तेरी हर राह है
तू ना शून्य पे सवार है
ये शून्य तुझ पे सवार है
शून्य भरे इस सगर में
तू ही तो वो तैराक है
जो लड़ रहा सफर में है
बस...कर न अब विलाप तू
इस तेरे विलाप में
ये शून्य बना महान है
ये शून्य बना महान है
कविता का सार
थोड़ा सा तो झुक जा तू
थोड़ा ले विराम तू
अब घमंड कर ले कम
बन जा अब महान तू
शक का कांटा तोड़ दे
कर भरोसा खुद पे तू
थोड़ा सा अब रुक के देख
की कहाँ बना ये शून्य तू
की कहाँ बना ये शून्य तू