सुनो...जब मैं न रहूँ..
तो अपनी कल्पनाओं का वो
नीला गुलाबी कमरा यूँही ही सजाये रखना..
सुनो...जब मैं न रहूँ...
वो जो हम छुट्टी के दिन घर का काम निपटा के..
नदी किनारे हाथों में हाथ लिए बैठते थे..
फिर खाना खा कर अपने सपनों के घर में आते थे..
उन यादों को यूँही बनाये रखना..
सुनो.. जब मैं न रहूँ..
मेरा गुस्सा मेरी लड़ाईयां..
तुम्हारा रूठना चुप हो जाना...
फिर मेरा तुम पर प्यार लुटाना..
फिर देर से सही तुम्हारा मान जाना..
उन लम्हों को भी दिल में समाये रखना..
सुनो...जब मैं न रहूँ..
मुझे दिल के किसी कोने में बिठाये रखना।।