"तुमने देखी मेरी हथेलियां और सराही बस उनकी कोमलता!
छूकर नहीं देखा ना ,वरना पाते कि मेरी लकीरों के बीच से उदित होता है सृष्टि का सूरज..
और खिलता है चांद..
तुम पाते घूमते कई ग्रह उपग्रह..
हां प्रकृति की देवी ने सौंपा था सारा ब्रह्माण्ड मेरी हथेलियों में ..
तुमने कविता लिखी कई बार मेरे कपोलों पर,
शब्दों में मेरे कंधो से कटि की दूरी कई बार नापी..
पर नहीं देख सके मेरी देह पर आदिम खरोंचे और आत्मा के प्राचीन गड्ढे,
जो मुझे मिले सर्जक होने के पुरस्कारस्वरूप..
मुझे देख सको इसलिए दर्पण लाए थे साथ..
नहीं समझ सके मै वो बिम्ब हूं जो दर्पण में आरेखित नहीं की जा सकती..
और कहते हो मुझे समझना मुश्किल है?! सुनो देखना हो तो भर लेना अपनी अंजुरी में प्रेम..
हां अंजुरी भर प्रेम में प्रतिबिंब दिख जाएगा मेरा! सच कहना,कभी मुझे समझना चाहा भी था तुमने?!" -
तुम्हारी ही....