#होंठ
बंद होंठों में जब प्रश्न कुलबुलाते हैं
टपकते हैं आँसू जब खुसफुसाते हैं।
पीर एक संवाद लेकर मौन हो जाती,
और एक आवाज़ में हम खनखनाते हैं।
भावना का तल हमेशा क्षुब्ध करता है,
जान रखकर मुट्ठियों में कसमसाते हैं।
भीगता है मन का मौसम,बावरा बनकर,
जब कभी चलते हुए हम डगमगाते हैं।
दृष्टि भी तकती न जाने किसको ढूँढे है,
और तितली देखकर हम मुस्कुराते हैं।
डॉ.प्रणवभारती