निशां छोड़ देंगे
किसी भी कहानी को अगर,
कामिल करना है तो, रफ़ीक़
दुनिया को वो तारीख बता दो,
वक़्त की हर सरहद मिटा दो
ज़हन में रक्खो उसकी ज़द्दो-ज़हद को,
जिस्म को उसकी हद मे तुम ला दो,
हिकायत (कहानी) के हर शख्स से, मिल लो तुम
तसव्वुरियत (imagination) की सारी बंदिशें हटा दो.
हांथों की फ़ितरत बहुत ग़मगीन है,
हर हुनर के आगे तमाशबीन है,
खुद को ही पीटते हैँ, ये उनकी जलन है,
नक़ल करना ही दुनिया का चलन है.
हर क़त्ल का ये, चश्मदीद खुद गवाह है,
मेरे शहर मे एक कातिलों का कारवाँ है.
तमाम ख्वाहिशें, यूँ ही अधूरी रह गयीं,
कागज़, कलम और स्याही सब बह गयीं.
आप कहते हैँ मुक्कम्मल जहां नहीं मिलता,
यही बात है मेरी, तनफ़्फ़ुस (breathing सांस लेने) की उलझन.
हम अपनी 'शीतल' नफ़स (सांस) आख़री तक,
कुछ दिलजस्प किस्से और निशां छोड़ देंगे.