सूरज भी दिन भर का चक्कर काटकर जब सो गया,
दिन मुर्झाया, रात खिली, और चाँद उजला हो गया
गीतों में, रचनाओं में, या प्रेमी की कल्पनाओं में
कभी प्रेयसी, तो कभी मामा.. वो उपमा ही बनकर रह गया
तारे को सितारा मिला, बंजारे को शाला,
ऐ "खूबसूरत" चाँद, तू फिर भी अकेला रह गया।
रातों को सोने का तो तेरा भी मन करता होगा
पर सारे जगत को चैन देकर, तू बेचैन रह गया,
कभी दुआ में, कभी पूजा में, तेरे आगे ही जुड़े हाथ हैं
परोपकार ही तेरी जिद है, पर अँधेरी रात ही तेरे साथ है,
देख रात भी ढल गई, और सवेरा हो गया,
ऐ "खूबसूरत" चाँद, तू एक बार फिर अकेला हो गया।