चांदनी
बीना चांद के, जिसका कोई भी अस्तित्व नहीं, मै हूँ वो चांदनी ।
फीकी पड़ रही हूँ, बिना तेरे ; पता है हर किसीको, चांद के बिना कैसी चांदनी !
अमावस्यकी रात बडी ही है लम्बी, जब चांद नही, तो कहां से होगी चांदनी !
न जाने कब तक यूहीं चलेगी यह अमावस्य की रात; उदास है बिचारि चांदनी!
ऐ चांद, तरस रही है तेरे दिदार को तेरी यह फीकी पड़ती हुई चांदनी ।
दर्शन दे ओ चांद मेरे, तरस रही है तेरे लिए, तेरी अपनी ही यह चांदनी।
बादल छाये हैं गहरे, काले और घनेरे; आंख मिचौनी न खेल, कहती है चांदनी ।
Armin Dutia Motashaw