दोहे
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लाल रंग की चूड़ियाँ,खन खन खनके खूब ।
बार बार साजन कहे, तुम प्रिय हो महबूब।
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दम दम दमके दामिनी, बारिश भी घनघोर।
तुम बिन कुछ भाता नहीं,व्याकुल मन का मोर ||
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पाती पढ़कर प्रेम की, मन में हलचल होय।
पिया मिलन की आस में, मन मेरा अब खोय।।
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सूना सारा जग लगे,घर आँगन सब मौन।
रैन बनी नागिन डसे,जहर उतारे कौन।।
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चकोर देखे चाँद को,बादल देखे मोर।
मैं देखूँ पिय आपको,तुम ही तुम सब ओर।।
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चंचल मन यह चाहता, पिया दरश हो जाय |
एक झलक देखूँ उसे, लूँ मैं नयन बसाय ||
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झलक पिया की देख कर , मन में नाचे मोर।
देख पिया को दिन गया, हुई रात से भोर।।
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रूप सुहाना यूँ लगे,ज्यों गुलाब का फूल ।
जो भी उसको देखता, खुद को जाता भूल।।
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित