#तत्काल
स्मृति का झरना
बहने लगता तत्काल,
जब आँगन में
घटा श्यामली
छाने लगती
और सभी बातें हो जातीं
विस्मृत,
जाने क्योंकर
बस केवल वो छवि एक
आ जाती बाहर
शब्द सभी बौने पड़ जाते
मूक वेदना की सिहरन से
और हृदय की गाँठे भी
कस- कस जाती हैं
मन जो बन बैठा था
पाषाणों सा निष्ठुर
जाने क्यों गंगा का पानी
बन जाता है---
बीता कल मेरे मन के
ऑंगन में क्योंकर
बार-बार फिर उलट
पलटकर घिर
आता है-----
डॉ.प्रणव भारती