ये वक़्त का कैसा मंजर है
हर दिल में बेचैनी डर है,
हर गली में ख़ौफ़ का साया है
हवा भी सहमी -सहमी है,
हर शहर में पसरा सन्नाटा
घर-घर में फैली बेचैनी है।
ये कैद ख़त्म कब होगी मां
बच्चे बार-बार पूछें,
बड़ों को भी तो पता नहीं
उनको जबाब कैसे सूझे।
जिनकी रोज़ी रोज कमाने की
उनकी आँखों में सिर्फ सवाल,
कैसे पेट भरें हम सबका
बेघर, भूखे,प्यासे बेहाल।
माना दौर बहुत मुश्किल है
फिर भी हिम्मत रखना है,
जीतेंगे ये जंग जरूर
चलो शपथ ये लेते हैं,
मिलकर सबको लड़ना है।
#मुश्किल