स्नेह स्वप्नों के खिले शतदल, आ गए पास कई अलिदल।
भाव तरंगे रही थी उछल, प्रेमपथ पर पाँव रहे थे फिसल।
प्रेममार्ग पर चलना नहीं सरल, प्रेम की जमीन नहीं समतल।
प्रेम के चारो ओर दलदल, प्रेम सुधारस है या हलाहल।
मिला पवन में प्रेम परिमल, पर कहाँ रह पाता है प्रेम निर्मल?
प्रेम में पल पल होता है छल, अफवाहें फैली है अनर्गल।
आसपास हो रही हलचल, शुरू हुई नई चहल पहल।
गुजरती रात करवटे बदल, आंखें हो रही स्मृति में सजल।
मन खुद से नहीं रहा संभल, चंचल मन होता विह्वल।
युग से लंबे लम्बे पल, जान न पाया खुद को आजकल।
प्रेम में जब होता निष्फल, प्रेम की हार से होता दुर्बल।
प्रेम से चालित सृष्टि सकल, प्रेम से मानव बनता सबल।
-दीपेश कामडी 'अनीस'
26/07/2020