वन्य जीव संरक्षण
रामसिंह नाम के एक जमींदार को शिकार का बहुत शौक था। वह प्रायः वनों में वन्य जीवों की खोज में घूमा करता था। एक दिन वह जंगल में शिकार हेतु गया और अचानक उसे एक हिरनी नजर आयी और उसने बंदूक उठाकर उसकी ओर निशाना साधा परंतु वह हिरनी खतरा भांपकर भी वहाँ पर खडी थी। यह देखकर रामसिंह को काफी अचरज हुआ और उसने आगे बढकर देखना चाहा तो वह दृश्य देखकर हतप्रभ रह गया। वह अपने बच्चे को वह दुग्धपान करा रही थी और उसका बच्चा भूखा ना रह जाये इस चिंता में उसे अपनी जान की भी परवाह नही थी।
यह दृश्य देखकर रामसिंह को अपने बचपन की याद आ गयी जब वह अपनी माँ की गोद में बैठकर वात्सल्य सुख लेता था। उसकी गलतियों को भी माँ नजर अंदाज कर देती थी और वह एक पल भी अपनी माँ की आँखों से दूर हो जाता था तो वह विचलित होकर पूरे घर को सिर पर उठा लेती थी। उसको अपनी माँ के प्रति प्रेम और श्रद्धा का मन में स्मरण हो आया और उसकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। वह अपनी माँ की याद मे इतना भाव विहल हो गया कि उसे यह भी याद नही रहा कि कब उसके हाथ से बंदूक छूटकर जमीन पर गिर गयी और उसने उस हिरनी के शिकार का इरादा त्याग दिया। वह उन दोनो को जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक कि वे आँखों से ओझल नही हो गये।
रामसिंह घर वापिस आता है तब तक उसका हृदय परिवर्तन हो चुका था। उसने निरीह एवं मासूम वन्य प्राणियों को मारने की प्रवृत्ति का मन से त्याग कर दिया अब उसने दृढ निश्चय कर लिया था कि वह वन्य जीवों के संरक्षण के लिए कार्य करेगा और एक शिकारी से वन्य जीव संरक्षक बनकर जीवन यापन करने लगा।