मैं और मेरी तन्हाई है....
ज़िंदगी मानो हर रोज बदल रही है
सुबह से शाम रातों में ढल रही है
हर रोज बदल रही मेरी परछाई है
कोई है ही नहीं मैं और मेरी तन्हाई है
इक रास्ता मानो मैंने पकड़ रखा है
ज़िन्दगी ने ज़िन्दगी को जकड़ रखा है
वक़्त के साथ - साथ जिये जा रहा हूँ
हर लम्हा तहाई का पिये जा रहा हूँ
न कोई वियोग है न ही कोई रोग है
ज़िन्दगी में कोई है ही नहीं हम दो लोग हैं
बस मैं और मेरी तन्हाई..
यूँ तो कहने को पांच लोग और भी है
चार दीवारें है एक छत है मूकदर्शक
तमाशीन हैं बस तमाशा देखते रहते हैं
मेरी हर नज़र पर नज़र कभी कुछ न कहते हैं
मैं बातें कर तो लूँ पर जवाब ही नहीं मिलता
शायद जख्म गहरा है इसलिए नहीं सिलता
करवटें होती है कभी पर आहटें होती नहीं
मैं रो देता हूँ साथ में छत - दीवारें रोती नहीं
न रुसवाई न जुदाई न ज़िंदगी मुस्कराई है
ज़िंदगी में कोई है ही नहीं मैं और मेरी तन्हाई है
बस मैं और मेरी तन्हाई है....
अमृत....