*"छाता" और "दिमाग़" की*
*उपयोगिता तभी है,*
*जब दोनों खुले हों।*
*अन्यथा„ दोनों ही*
*हमारे लिए बोझ हैं॥*
*"अहंकार" की आरी*
*और "कपट" की कुल्हाड़ी*
*“संबंधों” को काट डालती है।*
*'इत्र' 'मित्र' 'चित्र' 'चरित्र'„*
*किसी पहचान के मोहताज़ नहीं।*
*ये चारों, अपना परिचय*
*स्वयं देते हैं॥*
-*. जय सियाराम जी *