Hindi Quote in Poem by Dr kavita Tyagi

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जिनके आगे नतमस्तक थे सब
जिनकी आज्ञा सभी को होती थी श्रद्धा से शिरोधार्य
उन भीष्म पितामह और गुरु द्रौण के
कुछ निर्णय थे ऐसे तब जो
अब नहीं हो सकते स्वीकार्य

गुरुदक्षिणा में
अंगूठा एकलव्य का लिया
क्यों नहीं परिचय द्रोण ने
तब गुरुता का दिया
गुरु की लघुता ने मेधावी को
शिष्यत्व से वंचित किया
महालघुता ने वह छीन लिया,
जो शिष्य ने संचित किया
आत्मा ने अवश्य धिक्कारा होगा,
वाणी भी कुछ काँपी होगी
मान और धन के सुख की चादर
गुरु ने तब झाँपी होगी
तब धर्म था अर्जुन के हेतु
आशीर्वचन को पालना
इस धर्म में ही सहा होगा ,
आत्मा का सालना
अन्तःकरण की गर वे सुनते
शुभ होते सब.कार्य
कुछ निर्णय थे ऐसे तब जो
अब नहीं हो सकते स्वीकार्य

राजधर्म के पथ पर चलते
ऐसा काम पितामह कर गये
वधू की अस्मिता लुटी देख भी
जग में कर नींव मौन की धर गये
क्या वृद्ध तन-विमल आत्मधारी
पितामह जीते-जी ही मर गये
या वैभव में जीने के आदी ,
सुख-साधन छिनने से डर गये
तब हो या अब ,
आत्मा कचोटती जरूर है
सत्ता के सुख से राजधर्म
तब भी था मजबूर ,
आज भी मजबूर है
विमल आत्मा ,
त्याग-तपस्या
परदुखकातर शूर है
मानवता का धर्म बड़ा है
पालन है इसका अनिवार्य
कुछ निर्णय थे ऐसे तब जो
अब नहीं हो सकते स्वीकार्य

Hindi Poem by Dr kavita Tyagi : 111516033
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