मंद पड़ी थी ज्योत दिलों में उसे जलाने आया हूं
सुप्त पड़ चुकी भरी जवानी उसे जगाने आया हूं
धोखे पे धोखे खाए हम मानवता के दुश्मनों से
परदेशी तो थे ही दुश्मन उनसे ज्यादा अपनों से
कायरता आदत बन जाए उससे पहले जागे हम
इतिहास जानना ही होगा क्यों राष्टवाद से भागे हम
राष्ट्रवाद की ज्वाला को दिलों मै भड़काने आया हूं
मंद पड़ी थी ज्योत दिलों में उसे जगाने आया हूं
घर में छुपे दुश्मनों को मिट्टी में मिलाना ही होगा
घर के भेदी जयचंदों को औकात में लाना ही होगा
इतिहास भूगोल बदल गए सब नींद से जागेंगे कब हम
पृथ्वीराज प्रताप शिवा सम तेज दिखाएंगे कब हम
भूल चुके उस पराक्रम को अब याद दिलाने आया हूं
मंद पड़ी थी ज्योत दिलों में उसे जगाने आया हूं
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#ज्योत