# ज्योति
अँधियारा पलकों में भरकर
जीवन को मरुथल सा करकर
साँस अटकती हो चौबारे
क्यों इतने कष्टों को पीकर
जीवन की कड़वाहट में हम
क्यों हर पल जीते रहते हैं ?
क्यों अश्रु पीते रहते हैं ?
वातायन में ज्योति कितनी
हमने बंद कर लिया पटों को
लगे जुगाली करने हम सब
पकड़ लिया है सभी हठों को
न सीखेंगे अहं तोडना
कैसे ज्योति मुस्काएगी ?
अँधियारे की चादर फिर तो
मन में अँधियारा लाएगी
आओ,छद्म वेश को त्यागें
मन में भर लें ज्योति को सब
जाने जीवन कब पूरा हो ?
समय नहीं मिल पाएगा तब ---| |
डॉ. प्रणव भारती