कुलदीपक
वह एक सम्पन्न परिवार था। ईश्वर का दिया हुआ सब कुछ था कमी थी तो केवल इतनी कि कोई ऐसा नहीं था जो उस खानदान को आगे बढ़ाता। अनेक वर्ष बाद पुत्ररत्न का जन्म हुआ। उसका जन्म हुआ तो घर में जैसे कुलदीपक आ गया। उसके माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और मित्रों में हर्ष की लहर दौड़ गई। उनका सपना सच हुआ था। वे उसे लेकर एक सन्त के पास गये।
सन्त से उन्होंन निवेदन किया कि आप इसे ऐसा आशीर्वाद दें कि इसका जीवन प्रकाश पुंज के समान उज्ज्वल हो, ईश्वर के प्रति उसमें भक्ति, श्रृद्धा और समर्पण का भाव हो, जीवन में उत्साह की लय व ताल हो। उसके कर्म में सृजन व संगीत हो। उसके हृदय में शान्ति, प्रेम व सद्भाव हो सेवा ही उसका धर्म हो और श्रम, सदाचार व सहृदयता उसके साथी हों। उसे कभी भी अभिमान न हो एवं उसमें दूरदृष्टि हो। अवरोधों और कण्टकों में भी वह अपनी राहों को आसानी से खोज सके। उसके चेहरे पर सदा मुस्कान रहे। दुख की छाया से भी वह दूर रहे और वह सदैव लोककल्याण में लगा रहे। उसकी कर्मठता में सार्थकता हो। वह राग-द्वेष व दुर्भावना से दूर रहे। मद और मदिरा का उसके जीवन में कोई स्थान न हो। उसका भाग्य प्रबल होकर उसे लक्ष्य को पहचानने की क्षमता प्रदान करे और वह जीवन में हर पग पर सफल रहे। वाणी व कर्म से वह अटल हो। वह सब का सहारा बने और कुलदीपक के रुप में हमारा नाम रौशन करे।
यह सब सुनकर वे सन्त मुस्कराए और बोले यदि इतने गुण किसी मानव में आ जाएं तो वह देवता बन जाएगा। कलयुग समाप्त हो जाएगा और सतयुग आ जाएगा। इसे इतने आशीर्वाद देने की क्षमता तो मुझ में भी नहीं है। मैं स्वयं इतने गुणों से सम्पन्न नहीं हूँ फिर मैं इसे इतने आशीर्वाद कैसे दे सकता हूँ। मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि यह बालक सदा सुखी, समृद्ध एवं स्वस्थ्य रहे। हमें अपनी अपेक्षाओं को सीमित एवं व्यवहारिक रखना चाहिए वरना हम इनके पूरे होने की प्रतीक्षा में ही अपना समय व्यर्थ नष्ट करते रहेंगे। जीवन में स्वयं प्रसन्न रहो और दूसरों की भी प्रसन्नता की कामना करो। इतना कहकर वे सन्त मौन हो गये।
सबको सच्चाई का दर्पण दिख गया था। वे समझ गये थे कि जो भी होता है उसमें ईश्वर की कृपा के साथ ही हमारे कर्मों का भी हाथ होता है।