Hindi Quote in Poem by Dr kavita Tyagi

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उमड़-घुमड़कर बादल आये
बिजली चमकी अंबर में
मेरा मन भी ऐसे उछला
जैसे लहर समंदर में
खिड़की से जब बाहर देखा
बच्चे शोर मचा रहे थे
कुछ कागज की नाव बनाकर
बहते पानी में चला रहे थे
कुछ पानी में छप-छप करके
मन में खुशी मना रहे थे
मैं भी उनके संग में खेलूँ
मन में सपने आ रहे थे
मेरे होंठ भी गाने लगे थे
गीत जो वह सब जा रहे थे
इतने में माँ आकर बोली -
तुम हो मेरी अच्छी बेटी
बैठो घर के अंदर में
उमड़-घुमड़कर बादल आये
बिजली चमकी अंबर में
मेरा मन भी ऐसे उछला
जैसे लहर समंदर में

एक सखी ने आकर मुझको कहा , दिखाकर कुकुरमुत्ता
आ ! चल हम दोनों मिल खेलें, माँ-बाबू जी को दें बुत्ता
जब हम घर में लगे खेलने , दूध को पी गया आकर कुत्ता
माँ का गुस्सा बढ़ा देख यह , डाँटा बहुत दिया मुझे दुत्ता
क्यों जन्मी तू मेरी कोख से , हाय ! न जन्मा पुत्ता
मैं बोली, दिल छोटा ना कर
करके बड़ा दिल फर्क समझ तू लक्ष्मीबाई सिकंदर में
उमड़-घुमड़कर बादल आये
बिजली चमकी अंबर में
मेरा मन भी ऐसे उछला
जैसे लहर समंदर में

बड़ी हुई , तो मैंने चाहा , मैं भी कॉलेज जाऊँगी
घर में सबकी चिंता बढ़ गई , माँ बोली मैं समझाऊँगी
आस-पास कोई कॉलेज नहीं है , दूर कहाँ भिजवाऊँगी
अट्ठराह बरस के पार हुई तू , अच्छा वर ढुँढवाऊँगी
रानी बेटी बनेगी दुल्हन मैं गंगा नहा जाऊँगी
मैंने पूछा , मुझे बता माँ !
क्या मेरा अस्तित्व कहीं है ?
इस अज्ञात बवंडर में
उमड़-घुमड़कर बादल आये
बिजली चमकी अंबर में
मेरा मन भी ऐसे उछला
जैसे लहर समंदर में

डॉ. कविता त्यागी

Hindi Poem by Dr kavita Tyagi : 111513935
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