ग़ज़ल
प्रेम के पंछियों को बसर चाहिए
चांद तारों में बस इक शज़र चाहिए
अब दिवानों का मुश्किल गुज़ारा यहां
प्रीत से तर-बतर इक नगर चाहिए
वो मिला ही नहीं इस जहां में हमें
सोचती हूं कि जाना किधर चाहिए
बिन कहे मौन पढ़ ले मेरी शक्ल पे
एक जादूगरी हमसफर चाहिए
मीन को ख्वाहिशें जैसे जल की रहें
आपकी चाहतें इस कदर चाहिए
की ख़ता कुछ नहीं हो गए क्यों ख़फा
उनकी अब तो 'सुमन' कुछ ख़बर चाहिए
सीमा शिवहरे सुमन