एक दिन मैंने अपने आँगन में,
अनायास ही उग आए लालटेन की झाड़ी,
को काट फेंका बाहर सड़क पर.
और घर पर लायी थी फूल सूरजमुखी का..
सींच रही थी प्यार से,
इंतजार उसके पनपने का..
पर सुख चुका वो एक दिन,
ये अंत था उसके जीवन का..
पर एक दिन यूँही,
खिड़की से बाहर सड़क पर देखा.
छोटे-छोटे कोंपले आयी थी सुखी लालटेना पर,
अब रंग बिरंगे कईँ फूल खिल चुके थे..
मनमोहक तो था ही सुंगंधित भी..
जिसे फेंक दिया था मैंने कांटे समझकर यूँही..
जाने कितने मुशिकलों को पार कर ,
उसने फिर से खुद में जीवन ढूंढा होगा.
जाने कितने पतझड़ पर कर,
उसने फिर सावन ढूंढा होगा..
यूँ कटकर फिर मुरझाकर फिर से खिल उठा..
क्योंकि काटें जानते हैं,
उन्हें स्वार्थ भरे प्रेम की जरूरत नहीं है..
कितना सरल स्वभाव है कांटो का भी,
कितना तिरस्कार किये जाने पर,
फेंक दिए जाने पर, वो खुद पनप जाते है यूँही..
नजर में चुभते है, ये नजरिया भी है देखने का..
बस उन्हें ही नही चुभते जो सलीका जानते प्रेम का..
#सरल