ये सच है कि गांव भी अब बदल से गए हैं,
अब बरगद का वो पेड़ खाली सा रहा करता है,जहां बच्चों का मेला लगा रहता था।
अब नहीं दिखती वो लालटेन और दियों की रोशनी,
दूर शहर से अाई बिजली के सामने वो फीकी - सी पड़ गई।
अब नहीं दिखते वो छप्पर जो खपरों से बना करते थे,
सीमेंट की छतों के नीचे ही दब गए।
अब नहीं दिखते बैलों से चलते हुए वो हल,ट्रैक्टर की रफ्तार में वो कहीं पीछे ही छूट गए।
अब नहीं दिखते पेड़ों पे सजे वो झूले,इंटरनेट की दुनिया ने उन्हें वीरान कर दिया।
अब तो गांव की पगडंडियों को काली, पक्की सड़कों से जोड़ा जा रहा है.।
हां ये सच है कि हमारा गांव भी अब शहरों की तरफ दौड़ा जा रहा है।
..रॉयल..