ग़ज़ल
हमें उनसे मुहब्बत हो रही है
ये धड़कन ख्वाब हर पल बो रही है
उढ़ी नींदें इधर करवट बदलती
वो मखवल बिस्तरों पे सो रही है
बढ़ी धड़कन हमारी आज कल क्यों
ये जाने क्यों सबर ही खो रही है
मिला जब ख़त जुदाई का उसे अब
वो आंखें प्रेम रस से धो रही है
पिघलती मोम जैसी बिन हमारे
खुद ही अपना सितम वो ढो रही है
हुई हम से जुदा जो आज ऐसे
वो मोती याद के अब पो रही है
नहीं समझी सुमन वो साथ रहते
वो समझी अब अकेले रो रही है।
सीमा शिवहरे सुमन