मानव सेवा
मानस एक मध्यम परिवार का लडका था। वह मानव सेवा को ही अपना धर्म एवं कर्म मानता था। उसे पूजा पाठ, मंदिर दर्शन आदि में कम विश्वास था परंतु वह सेवा कार्यों में निरंतर अपना समय देता था। वह एक शासकीय अस्पताल में प्रतिदिन शाम के वक्त दो घंटे देकर वहाँ भर्ती मरीजों के हालचाल पूछकर उन्हें सांत्वना देकर उनका उत्साहवर्धन भी करता था। उनके छोटे मोटे कार्यो में उनकी सहायता कर देता था और सप्ताह में एक दिन मरीजों को अपनी ओर से पौष्टिक नाश्ता उपलब्ध कराता था।
एक बार नगर के एक संपन्न व्यवसायी को अस्पताल में कुछ दिन के लिये भर्ती किया गया। वह मानस की गतिविधियों से आश्चर्यचकित थे कि बिना किसी स्वार्थ के वह ऐसा क्यों करता है ? एक दिन उन्होने उससे पूछ ही लिया कि तुम्हें ऐसा करने से क्या लाभ होता है ? उसने विनम्रतापूर्वक कहा कि मैं मानव सेवा को ही ईश्वर की सेवा मानता हूँ तथा अपने सामथ्र्य के अनुसार ही यह पुनीत कार्य कर पाता हूँ। सेठ जी उसकी भावना से बहुत प्रभावित हुये। कुछ दिनों बाद उनकी अस्पताल से छुट्टी हो गई। एक दिन उन्होने मानस को बुलाकर कहा कि तुम्हारे विचारों ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। अब तुम प्रतिदिन मरीजों को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराओ इस पर होने वाला सारा व्यय मैं वहन करूँगा।
तुमने मेरे व्यापार के सिद्धांतों को नई विचारधारा दे दी है। मैं अभी तक धन कमाता था एवं उसे अपने परिवार की आवश्यकताओं पर खर्च करके जो बचता था उसका कुछ भाग सेवा में खर्च कर देता था परंतु अब मैं सेवा करने के लिये धन कमाऊँगा, एवं अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हुये उसे सत्कार्यों में खर्च करूँगा।