गर फ़िर भी,
समझ ना आए ये जिंदगी,
पीछे मुड़कर देखना,
कैसे जब दो साल के थे,
और माँ का आँचल पकड़कर चलते थे,
पापा की उंगली पकड़कर चलना सीखे थे,
तुमको देखकर कैसे उनकी आँखे चमक उठते थे,
तुम भी उनका सहारा बनोगे,
इसके सपने से ही वो खिल उठते थे,
एक किलकारी से उनके सारे दुःख जाते थे,
सारे थकान मिट जाते थे,
गर फ़िर भी,
समझ ना आए ये जिंदगी,
पीछे मुड़कर देखना,
कैसे किसी के आँख के तारे हुआ करते थे।
-KrishnaKatyayan