चले थे राह चुनने मौत की , जिंदगी से हारकर अपनी
लगा ऐसा हुआ सब खत्म , बोझिल है जिंदगी कितनी
मिली हिम्मत जो देखा मैं , नन्ही सी प्यारी मुनिया को
उठाए बोझ जीवन का , अथक सी नापे दुनिया को
सहायक बन गई बचपन में , छोड़कर गुड्डे - गुड़ियों को
नहीं लगता है उसको बोझ , समेटे है वो माला की लड़ियों को
नहीं लगती थकान उसको , नहीं है दर्द बिल्कुल भी
सगे उसके हैं सारे दर्द , वो बुलबुल और वो गुल भी
देखकर उसको शरमाया , हम तो काबिल हर नज़र में
फिर क्यों हारा बिना संघर्ष , गिर चुके अब खुद की नज़र में
#हिम्मत