નેટવર્ક તારા જેવું થઈ ગયું છે,
ગમે ત્યારે વળગે ગમે ત્યારે અળગું...
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तुम मुझे दिल के पास रखा
करते थे, कमीज़ में छुपाकर !
बाद मैं कहीं पर भी छूटने लगी,
मेज पर - गाड़ी में - बिस्तर पर!
खाली पडी रहती तुम्हारे इंतजारमें,
तुम बिना देखे रख देते चार्जिंग पर?
खुद को बांधे रखती हर हाल में
पर तुम उठाते सिर्फ अपने वक्त पर।
ज्यादा से ज्यादा काम आती, पर
तुम फिर भी तलाशते और बेहतर।
तुम मसरूफ हो जाते नेटवर्किंग
की भीड़ में, मुझे पास बुलाकर।
काश मैं भी अपना हिस्सा जी लेती
तुम्हारा आखरी मोबाईल बनकर ?
तुम्हारे टचस्क्रीनी जAजज़्बातों ने
रख दिया है मुझे साइलेंट मोड पर...
© लीना प्रतीश