प्रिय पेंसिल....
तु प्रिय इसलिए है कि खुद छिल जाती हो
लेकिन धारदार बनकर सचोट लिखती हो
मिट भी जाना पड़े तो बेजीजक मिट जाती हो
कभी लिखती हो तो कभी चित्र बनाती हो
तु छुप जाती हो और रंग उभर आते है
तु हमेशा बलिदान की भावना रखती है
लेखन जगत की तु भी शोर्य वीरांगना है
~Shree