अब बच्चे उड़ना सीख गए ,
माँ बापू को दिन दीख गए
अपनी संस्कृति इतिहास बनी , जब बेटे सेवा करते थे
अंधे माँ-बाप को काँवड़ में बिठला कंधे धर चलते थे
अपनों का स्नेह अब हार गये, भौतिक सुख-साधन जीत गए
माँ-बाप को अब दिन दीख गए
स्वार्थ का दानव लील गया, रिश्तो की सारी नमता को
हँसना-गाना तो भूल गए , लकवा मारा प्रसन्नता को
धन की लिप्सा बस साथ रही, पीछे सब शत्रु-मीत गए
माँ-बाप को अब दिन दीख गए
सोचा था धन से मिल जाएगा , सब कुछ दुनिया के बाजारों में
रिश्तो की नहीं जरूरत है , अब यूज एंड थ्रो की बहारों में
भीड़ में भी है अकेलापन और प्रेम भाव से रीत गए
माँ-बाप को अब दिन दीख गए