व्यथा
राममनोहर जी एक प्रसिद्ध कवि थे जो कि समाज में हो रहे परिवर्तन एवं सामयिक विषयों पर कविताओं का सृजन कर उन्हें रोचक ढंग से श्रोताओं को सुनाते थे। जब वे उन्हें सुनकर प्रषंसा करते थे तो राममनोहर जी की आत्मा प्रसन्न्ता से तृप्त हो जाती थी। उन्हें अपनी काव्य रचनाओं से प्रसिद्धि तो बहुत मिलती थी परंतु धनोपार्जन अधिक नही हो पाता था। इससे उनकी पत्नी दुखी रहती थी एवं सुझाव देती थी कि आप कहीं अच्छी नौकरी कर लीजिये और इसके बाद कविताओं के सृजन पर ध्यान दे। आपको प्राप्त होने वाली सम्मान राषि से घर चलाना बहुत मुष्किल होता है। राममनोहर जी यह सुनकर मुस्कुरा कर चुप रह जाते थे।
एक बार मुंबई के एक कवि सम्मेलन में उनकी प्रस्तुति सुनकर एक काव्यप्रेमी उद्योगपति राकेष आनंद बहुत प्रसन्न हुये। सम्मेलन के पष्चात् उन्होने राममनोहर जी से मिलकर कहा कि वे उनके बहुत बड़े प्रषंसक हैं और उन्हें अगले दिन अपने घर आने का निमंत्रण दिया। दूसरे दिन वे सज्जन स्वयं उन्हें लेने के लिये आये। रास्ते में चर्चा के दौरान उन्होंने साहित्य के क्षेत्र में नवागंतुकों के लिये एक ऐकेडमी बनाने की इच्छा बताते हुये कहा कि इसका उद्देष्य साहित्य के विभिन्न आयामों से साहित्य प्रेमीयों को अवगत कराते हुये आम लोगों में साहित्य के प्रति रूचि जागृत करना है। उन्होनें राममनोहर जी से उनके मार्गदर्षन में इसके गठन का अनुरोध करते हुये समस्त आर्थिक व्यय को वहन करने हेतु आष्वस्त किया। राममनोहर जी की स्वीकृति के उपरांत राकेष आनंद ने उन्हें सवैतनिक पद देकर इसका कार्यभार सौंप दिया। इस प्रकार राममनोहर जी आर्थिक समस्या का निदान होकर उनकी बौद्धिक क्षमता से साहित्यप्रेमी लाभांवित होने लगे।