देसी वाले आम,
जब गर्मियां ख़त्म होने की कगार पर रहती थीं,और बारीशें शुरू होने को,यूं कहें जेठ और आषाढ़ का महीना,जब दोपहर को खलिहान के पास वाले आम के बड़े वाले पेड़ की छांव में हम लोग क्रिकेट खेला करते थे।फिर जब पके हुए आम गिरते थे,तो उन्हें घर ले कर आना और खाना,थोड़े खट्टे थोड़े मीठे।कभी कभी जब आंधी के साथ बारिश होती थी,तब वहीं पेड़ के पास एक भीड़ जुट जाती थी,बच्चों की,कुछ बड़ों की।और फिर घर पर आम का पना और अमावट डालने की अलग तैयारी रहती थी।मेरा रुचि थोड़ी कम हुआ करती थी,फिर भी थी,लेकिन भैया सबसे ज्यादा उत्साहित रहा करता था,उसे आम खाना भी पसंद था और लाना भी।
कुछ बरस हो गए हैं उस बड़े वाले आम के पेड़ पर बिजली गिरी और वह झुलस कर सूख गया,अब भी कई पेड़ हैं,उनमें आम भी आए थे,इस साल,लेकिन अब वह बचपना और आम की होड़ नहीं है,अब आम तो घर आता है लेकिन किसी और आदमी के द्वारा तोड़वाकर और कई हिस्सों में बांट कर।मुझे उन पेड़ों के पास गए कई साल हो गए,अब भी आम पकते हैं,तो एक भीड़ देखता हूं,जो गांव के दूसरे बच्चे हैं (अब घर का कोई बच्चा या लड़का नहीं जाता),चेहरे पर उनके अजीब संतोष रहता है,जो कभी हमारे चेहरों पर होता था।
ख़ैर अब बड़ा वाला पेड़ भी नहीं है,अब भईया भी नहीं है,और अब भी दूसरे आम पके हुए हैं,इस बार आखिरी में टूटे आमों को पकने के लिए रख दिया गया है,जो धीरे धीरे पक रहे हैं,लेकिन मैं अब भी उस बड़े वाले पेड़ को खोजता हूं और भईया को भी।
आनंद