#आसमानी
मैं धरा हूँ किंतु हूँ मैं सखी तेरी
आसमानी रंग में मैं तो रंगी री
दूब की इस हरीतिमा से तन है पुलकित
और चूनर आसमानी से सुसज्जित
प्राण में मेरे किलकती है रवानी
रंग तेरा मन भिगोता आसमानी---
मैं विकल सी होके चूनर ढूंढती थी
अपने ही सारे किनारे खूंदती थी
किंतु जब से स्नेह से भीगा मेरा मन
आँख में सपना सजाया आसमानी---
नेह के उन बादलों में स्नेह भरकर
अंक में अपने दुलारा है सजाकर
अब धरा जब ओढ़ती है ये चुनरिया
प्रीत की अंगनाई भीतर हैं सजी री
आसमानी रंग में मैं तो रंगी री-----।।
डॉ.प्रणवभारती