महाभारत
अमर थी वह अमर रहेगी
ऐसी अमर यह गाथा है
पाण्डव तथा कौरवों का युद्ध था
महाभारत जो कहलाता है।
दुर्योधन ने शकुनि के संग
बिछाया था मायावी जाल
न पता था कुंती पुत्रों को
मंडरा रहा था उनपर काल।
छल के जाल में थे फंसे पाण्डव
हुआ द्रौपदी का चीर हरण
ली थी प्रतिज्ञा पाँचों ने कि
अब होगा कौरवों का मरण।
शंखनाद की ध्वनि से
आरंभ हुआ संग्राम
पाँचों पाण्डव सज्ज थे
और सैनिक खड़े तमाम।
किंतु अर्जुन था व्याकुल
लगाया कृष्ण ने अनुमान
रणभूमि के मध्य में
वह थे विचलित-परेशान।
कुरुक्षेत्र के बीच में
कृष्ण ने पूछा कारण
किस बात से भयभीत हो अर्जुन
संभवतः मिले इसका निवारण।
भीष्म, द्रोण, दुर्योधन संग
युद्ध करना होगा पाप
यही तो हैं मेरे अपने
नहीं लड़ सकता मैं इनके साथ।
अपनों का लहु बहाना
यह नहीं है मुझे स्वीकार
इस कुरुक्षेत्र के युद्ध का
मैं नहीं बनूंगा भागीदार।
यह सुनकर गोविंद भी
यह गए आश्चर्यचकित
अर्जुन की इस व्यथा से
वह भी हो गए व्यथित।
विराट रूप धारण किया
मुख में दिखाई सृष्टि
श्रीकृष्ण की इस माया से
अर्जुन की खुली रह गई दृष्टि।
आकाश, जल, वायु, पावक
हो गए सब स्तंभित
इस दृश्य को देखकर
अर्जुन भी रह गया अचंभित।
कृष्ण ने फिर प्रारंभ किया
वह महान उपदेश
भगवतगीता नाम का
वह ग्रंथ विशेष।
श्रीकृष्ण बोले अर्जुन से
मैं हूँ तीनों लोकों का स्वामी
हर मनुष्य में मैं हूँ बसता
मेरी संतानें हैं सभी प्राणी।
किया वर्णन मनुष्यों का
दिया सात्विकों का ज्ञान
राजसी और तामसी से
भी था अर्जुन अज्ञान।
श्रीराम, वामन और कच्छप हो
या वो हो नरसिंह
मेरे ही अवतार हैं ये
मैं नहीं हूँ इनसे भिन्न।
अर्जुन ने पूछा माधव से कि
क्या है इस युद्ध का महत्व
गोविंद ने बतलाया कि
यह युद्ध है उसका कर्तव्य।
धर्म की स्थापना
और स्त्री के सम्मान के लिए
युद्ध करना होगा तुमको
अधर्म के विनाश के लिए।
शंकाओं से दूर होकर
हाथों में अपने शस्त्र धरे
तैयार था अर्जुन युद्ध के लिए
शत्रु जो हैं यहाँ खड़े।
धनुष उठाकर शत्रुओं का
नाश करना है मेरा धर्म
आपके उपदेशों से
मुझे पता चला है मेरा कर्म।
तब सार्थी बनकर अर्जुन का
उन्होंने किया मार्गदर्शन
अभिमन्यु की ही भाँति
सभी ने दिया अमूल्य समर्पण।
पाँचों पुत्रों की मृत्यु पर भी
मनाया था पाण्डवों ने शोक
पर तभी आशा का दीपक जला
जब भरने वाली थी उत्तरा की कोख।
धृतराष्ट्र पुत्रों का अंत हुआ
पाण्डवों की जीत हुई
आर्यावर्त में उत्साह जगा
पाण्डवों की जय-जयकार हुई।
राज्याभिषेक हुआ युधिष्ठिर का
सम्राट पद धारण किया
समस्त आर्यावर्त के दुखों से
प्रजा का निवारण किया।
यही थी वह अमर गाथा
जो सदियों से सुनाई जाती है
धर्म पर विजय की कहानी
महाभारत के नाम से बतलाई जाती है।