जब बच्ची थी , तब.बेटी थी मैं ,
अब उम्र में हुई सयानी हूँ ।
माँ का हृदय क्या होता है ,
माँ बनकर मैं जानी हूँ ।।
मेरे कलेजे का टुकड़ा
शैशव वयः में चुप रहता था
कभी-कभी अपनी पीड़ा को
सश्रू रुदन में कहता था
शिशु-वेदना को तब मेरा
मातृ-हृदय शब्दों में कहता था
बोलना जब तक सीख न पाए ,
तब तक मैं शिशु की वाणी हूँ ।
माँ का हृदय क्या होता है ,
माँ बनकर मैं जानी हूँ ।।
बचपन में नादान भूख से
बस उदास हो जाता था
गुरुजनों की डाँट सहन कर
दौड़ मेरे पास आता था
ममता के आँचल में छिपकर
आँखें छलछल छलकाता था
बेटे के सूक्ष्म अंतर्मन की
मैं व्यक्त कहानी हूँ ।
माँ का हृदय क्या होता है ,
माँ बनकर मैं जानी हूँ ।।
वयस्क हुआ है अब वह बेटा ,
नित्य नयी तकनीकी सीखता है
डेढ़ गुना आकार है माँ से ,
महाबली-सा दीखता है
माँ के निर्देशों को अब
बचकानी बातें कहता है
नयी पीढ़ी के नये ज्ञान से
क्योंकि मैं अनजानी हूँ ।
माँ का हृदय क्या होता है ,
यह मैं माँ बनकर जानी हूँ ।।
बेटी थी जब बच्ची थी मैं ,
अब उम्र में हुई सयानी हूँ ।
माँ का हृदय क्या होता है
, यह मैं माँ बनकर जानी हूँ ।।